मैं कौन हूँ यह ,जिस दिन जान पाउँगा ,वह मेरे जीवन के एक मात्र उपलब्धि होगी /लेकिन यह जानने की न कोई इच्छा है मेरी और ना ही इस बात के लिए मैं सोचने वाला हूँ / मैंने जो मदहोश हुआ ,उसी ख्वाब में डूबा रहना चाहता हूँ ,आकंठ और अखंड, यही मेरी साधना और यही तृष्णा है आओ मेरे पथिक ! मेरी नीरसता से विश्राम पा सको! आओ प्यारे !अगर मुझ में समा सको !-तुझ पे अपना भार सौप कर मैं तो उड़ा!
Sunday, January 22, 2012
Saturday, January 21, 2012
रुश्दी और भी हैं
रुश्दी और भी हैं
हम भारतियों की आदत रही है की एक ही पल में अपनी संस्कृति की प्राचीनता,अखण्डता और प्रासंगिता का ढिंडोरा पीटना और दूसरे ही पल उसी संस्कृति के पतन और सम्भावित खतरों पर हाय –तौबा मचाना ,द्वन्द्व तो इतना की एक ही पल हम अपनी महानता का यशोगान अपने ही मुख से मुक्त –कंठ करने लगते हैं और दूसरे ही पल उसी महान देश के वही देश –प्रेमी देश के पतन पर ओजपूर्ण व्याख्यान बाँचना अपना परम कर्तव्य समझने लगते हैं |
संस्कृति और इतिहास पर हमें गर्व होना ही चाहिए परन्तु बात –बात पर “सांस्कृतिक पतन –सांस्कृतिक पतन” का शोर करना ये कैसा विरोधाभास है ?
एक फुटकर अभिनेत्री जिनकी अभिनय क्षमता कुछ अश्लील चलचित्रों में प्रदर्शित हुई ,उनके एक भारतीय टी .वी श्रृखंला में उपस्थिति को लेकर संस्कृति के पतन की परिकल्पना कर ली गयी और विरोध और नारेबाजी के हमारे जन्मसिद्ध अधिकार ने ‘बा –मुश्किल’ हमारी सभ्यता और संस्कृति को बचाया |
अगर एक महत्व-हीन अभिनेत्री जिसका नाम भी कई लोग हंगामे के बाद ही जान सके ,वो हमारी ५००० वर्ष पुरानी तथा ऋषिओं द्वारा संचित और बलिदानों से पोषित सभ्यता और संस्कृति के पतन का कारण बन सकती है तो अच्छा होता की ऐसी कमजोर सभ्यता और संस्कृति मिट्टी में मिल जाती ,फिर तो अकारण ही हमारे अगिनत सपूतों ने अपना वक्त बर्बाद किया ,सब पर भारी तो वो कल की अभिनेत्री निकली ,जिसके एक घंटे के टी.वी शो ने हमारी इतनी पुरानी सभ्यता को लग-भग चौपट कर दिया |
एक विदेशी जोड़े ने जयपुर में हिंदू -पारंपरिक विधि से शादी रचा डाली ,अख़बारों और मीडिया ने फुटेज दे दी ,बस शुरू हो गया ‘सांस्कृतिक-गायन’ ,किसी ने इसे भारतीय परंपरा की विजय तो किसी ने हिंदुत्व की विश्वविजय तक बता डाला ,न उन जोड़ों को भारतीयता से मतलब था न हिंदुत्व से ,उन्होंने अपना शौक पूरा करने के लिए यह स्वांग रचा था ,कई लोगों ने हवाई –जहाज पर अपने ब्याह के शौक को पूरा किया ,तब किसकी विजय हुई थी ?
कल मैं रुश्दी साहब के संदर्भ में लिखने को सोच रहा था ,थोड़ी थकावट और आलस्य के कारण कार्य को अगले दिन पर छोड़ दिया |सुबह दैनिक जागरण में एस शंकर जी का लेख दिखा ,उन्होंने भी उसी शीर्षक का चुनाव किया जो मैंने सोच रखा था ,-“सलमान रुश्दी के बहाने”, लेकिन प्रसन्नता हुई की कमसे कम किसी साहित्यकार ने उनकी यात्रा का विरोध कर रहे सांस्कृतिक संरक्षकों का प्रतिवाद तो किया ,पर उन्होंने भी केवल एक कौम और उसकी तुष्टीकरण में तत्पर एक पार्टी को खरी –खोटी सुना लगभग सभी विवादित कलाकारों जैसे तस्लीमा ,हुसैन ,दीपा मेहता आदि को उसी तुष्टिकरण से जोड़ दिया |
पहली बात चाहे वो रुश्दी साहब रहे हों या तस्लीमा जी ,ये नास्तिक ही रहे और ईश्वर को इन्होने कभी भी स्वीकार नहीं किया ,उन्होंने आस्था के रास्ते चलना स्वीकार नहीं किया ,अगर उनमे आस्था का आभाव है तो उनकी समस्या है ,आप क्यों व्याकुल हो रहे हैं ?दोजख और नरक उन्हें मिलेगी आप क्यों पागल हो रहे हैं ?
दूसरी बात अगर उन्होंने किसी कौम के विरुद्ध कोई अभिव्यक्ति दी ,तो कई विज्ञानी तो ईश्वर या खुदा को बकवास बताते चले आ रहे हैं ,बुद्ध ने भी ईश्वर को नाकारा ,तो सिर्फ रुश्दी साहब पर फतवा क्यों ?आधिकारिक रूप से चीन नास्तिक है ,सारे मार्क्सवादी नास्तिक हैं ,तो कीजिये चीन पर फतवा जारी,भेजिए पत्र केंद्र सरकार को की करोड़ों लोगों की भावना को ध्यान में रख चीन के दूतावास को बंद किया जाये ,लेकिन इसकी हिम्मत आपमें नहीं है ,सिर्फ एक लेखक को धमका कर अपनी पीठ थपथपाते जाएँ और संस्कृति को शिखंडी के स्थान पर आपोरित करते जाएँ |
तीसरी बात उन्होंने तो मात्र अभिव्यक्ति दी आप तो जान लेने पर उतारू हो गए ,तर्क को तर्क से परास्त न कर आप कुश्तीबाजी पर उतारू हो गए ?इसी बौद्धिकता और दर्शन को आप संस्कृति का नाम दे रहे थे ?बेकार ही आपने इस रीढ़ –विहीन संस्कृति को ढोया|
एक और बात शंकर जी के अनुसार रुश्दी साहब अब अप्रासंगिक हैं और अरब देशों में भी उन्हें कोई पढता नहीं ,उनकी लोकप्रियता का कारण मात्र उनका विवादास्पद लेख रहा है ,और एक कौम के तुष्टिकरण के लिए उनका विरोध किया गया |
मैं मानता हूँ एक सरकार का दायित्व था की उन्हें संरक्षण दे ,खास –कर ‘अतिथि –देवो भव,’ के सूत्र वाक्य वाले राज्य –सरकार का |लेकिन न रुश्दी जी ,न तस्लीमा जी और न हुसैन साहब ,सिर्फ विवादों ने तो उन्हें मुकाम नहीं दिया ,अगर ऐसा होता तो तोगड़िया जी और वरुण जी को कला की दुनिया ने उस स्थान पर क्यों नहीं स्थापित किया ?
वस्तुतः कलाकार अपनी कला से आबद्ध और स्वभाव से विद्रोही होता है ,तुलसी ने संस्कृत को छोड़ लोकभाषा का चुनाव किया ,काशी जैसे धर्मस्थल ने उनका जीना मुहाल कर दिया ,कबीर ने विद्रोह किया और उनसे अधिक किसने इस्लाम तथा हिंदुत्व का माखौल उड़ाया,क्या यह सब सस्ती –लोकप्रियता थी ?क्या कलाकार अब बनिये की तरह नाप –तौल शुरू कर दे ?कला और साहित्य इतनी सस्ती नहीं है न साहित्यकार भाट! ‘लालू –चालीसा’ लिखकर माननीय बनने की कला सबके बस की बात नहीं ,आत्मा का सौदा हर किसी के बूते नहीं |
क्या खजुराहो के मूर्तियों से अधिक नग्नता और अश्लीलता हुसैन साहब की चित्रकला और दीपा जी के फिल्मों में आपको दिखाई देती है ?तब तो हिंदू संगठनो को सबसे पहले उसका विरोध करना चाहिए |जमींदोज कर दें उन्हें क्योकि आपकी संस्कृति के अनुकूल तो दिखाई नहीं पड़ती वो प्रतिमाएं |
बात तो इतनी ही है की न खजुराहो के शिल्पी अश्लील थे न हुसैन ,उन्होंने मानव की आतंरिक नग्नता को बहिर्मुखी किया ,महावीर नग्न हुए ,कृष्ण ने गोपियों को वस्त्रविमुख किया ,फिर उन्हें क्यों पूजते हैं ?महावीर और कृष्ण के विद्रोह ने उन्हें महान बनाया ,नग्नता में सहजता थी |
दोषपूर्ण आपकी मानसिकता है ,आप नग्न देखना चाहते हैं और जो आप देखना चाहते हैं वही देख पाते हैं ,या आप अंधे हैं ,हिंदू संगठनों के एक नेता ने कहा उसने हमारे खिलाफ लिखा ,आप ने भी वही पढ़ा ,किसी और ने कहा उसने हमारे विरूद्ध चित्र बनाया ,आपको वही दिखा ,लोकतन्त्र की कठपुतली ,चाभी वाली ,अश्लील और भद्दी |
कलाकार अगर सहज न हो तो सृजन आरोपित हो जाये |साहित्य समाज का आइना है-यह सिर्फ रटने की बात नहीं है , अगर साहित्य –शिल्पी सहज अभिव्यक्ति न करें तो साहित्य सरकारी गजट हो जाये जो आपको पुरस्कार तो दिला सकती है ,सरकारी पुरस्कार इस शर्त पर धिक्कार से अधिक कुछ भी नहीं|कीमत का आकलन आप स्वयं करें ..........!
Thursday, January 19, 2012
बा ,बुआ और बाबा
बा ,बुआ और बाबा
कुछ वर्षों पूर्व तब के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक चुनावी सूक्ति अत्यंत प्रचलित हुई थी –“काँग्रेस पकी –पकाई खाने को तैयार है |”
संयोग से उनकी बात सच भी हो गयी और ‘इंडिया शाइनिंग’ की चमकीली हांड़ी में तैयार माल को गटक कर कांग्रेस ने जता दिया की पका –पकाया खाना कितना स्वास्थ्यप्रद है ,अटल जी एंड कम्पनी को कच्चे –पके खिचड़ी पर संतोष करना पड़ा ,बेचारे अभी तक पेट पकड़ कर घूम रहे हैं |
‘बिहारी के दोहे’ और चुनावी सूक्तियाँ गहरे घाव देने के लिए कुख्यात रहे हैं ,मुझे तो यह समझ में अब तक नहीं आया की ‘बिहारी जी’ को अपने पाठकों से क्या दुश्मनी रही होगी की खुलेआम उन्हें चेतावनी देनी पड़ी अगर ‘सतसई के दोहे’ पढोगे तो होनी –अनहोनी का दायित्व तुम्हारा ,मैंने बम तैयार कर दिया है ,पलीदे में आग लगाई तो तुम जानो ,मुझे फिर दोष मत देना ,मैंने पहले ही मना किया था |
यह भी हो सकता है प्रकाशकों ने पब्लिसिटी स्टंट के लिए ऐसा जान-बूझकर प्रचारित किया हो |खतरनाक रचनाओं का मार्केट वैल्यू अधिक होता है |
खैर इस बाबत तो बिहारी जी या उनके प्रकाशक ही किसी प्रेस कांफ्रेंस में बता सकते हैं ,हम तब तक यू .पी का एक चक्कर लगा लें | ,
राहुल बाबा ने ‘साध्वी –कम –नेत्री’ और ‘नेत्री –कम –साध्वी’ को अजब एम.पी से गजब यू.पी आगमन की शुभकामना भेझ दी और राहुल जी को बैठे –बिठाये उनमे अपनी बुआ जी के दर्शन हो गए ,राहुल जी की मुहबोली बुआ अर्थात उनकी माता जी की मुहबोली ननद |
ननद और भाभी की नोकझोंक की पौराणिक परंपरा का निर्वाह करते हुए साध्वी बुआ ने दो –चार आशीर्वचन भी आनन-फानन में दे डाले |भाभी के मायके की उलाहना ननद का जन्म –सिद्ध अधिकार रहा है ,इसमें खोट निकालना उनके पारिवारिक मामलों में हस्तक्षेप है |
अंबानी बंधुओं के भरत-मिलाप और डंडिया नृत्य का कोई लाभ उन्हें मिला हो या नहीं ,सिवाय मीडिया के ,लेकिन साध्वी जी को साधना का फल तुरत ही मिल गया और अपनी पार्टी में उनका रुतबा दो गज ऊपर हो गया |नए-नए बने रिश्तों ने उन्हें फौरी तौर पर उबार दिया ,पार्टी जो कल तक पारी की हार बचाने की जुगाड में थी अब फोलो-आन देने का स्वप्न देख रही है |- "मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ “
सुना है कलराज मिश्र जैसे महान नेतागन इस नए रिश्ते से खफा हैं ,यह तो अनर्गल प्रलाप है |उन्हें भी तो मायावती जी ने एक बार अपना मुह्बोला भाई बनाया था और राखी भी बांधी थी ,अब रिश्ता निभाना उन्हें नहीं आया तो इसमें साध्वी का क्या कसूर ?रिश्ता बनाना और निभाना तो दो अलग बातें हैं |अपनी बहन जी से रिश्ता तोड़ कर उन्हें क्या मिला “न माया- न राम |”बहन जी तो तीन –तीन बार गुनगुनाया –‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’|पर उस दुखिया को उन्होंने अनसुना कर दिया|
एक और नेता जी जो अपने कई बड़े भाईयों के छोटे भाई बन कर अपना कर्तव्य निभाते रहे उनसे अलगाव के बाद कर्तव्यों की तलाश में भटक रहे हैं ,सीजन निकला जा रहा है और बेचारे को एक अदद क्लाइंट की तलाश है |खबर तो यह भी है किसी बड़े नेता के मुखारविंद से गालियाँ सुनने की लिए भी वो तैयार हैं बशर्ते मीडिया वहाँ हो |अर्थात रिश्तों के खातिर उन्हें गालियाँ भी मंजूर है -,स्पोर्टिंग स्पिरिट |
कुछ लोगों को इन रिश्तों में परिवारवाद नज़र आता है इनकी नज़र का क्या कहना उन्हें तो हरेक अभिनेत्री में अपनी भावी पत्नी और अपनी वर्तमान पत्नी में विष –कन्या नज़र आती है ,खासकर पगार के दिन |
वैसे परिवारवाद का समर्थन मैं भी नहीं करता ,मैंने अपने १० पुत्रों में ८ को अलग –अलग पार्टियों में भर्ती करवा दिया है और बचे दो में एक का नामांकरण ‘मैं अन्ना हूँ ,’ तथा दूसरे का ‘मैं रामदेव हूँ कर दिया है |’
चूँकि मेरे पीठ के दर्द को पुलिस के डंडे से विकराल होने का भय है अतः चिकित्सक की सलाह पर खुद राजनीति से दूर रहता हूँ,सिर्फ चुनाव के दिन अपने मतदाता होने का फ़र्ज़ पूरा कर देता हूँ ,दर्द से बचने के लिए तथा मात्र उपहार को स्वीकार करने हेतु लौटते समय एक पौवा का सेवन कर लेता हूँ |
हाँ ,जिन –जिन वीरांगनाओं को अपनी प्रियतमा बनाने और उनसे रिश्ते प्रगाढ़ करने की कोशिश की उन सब से राखी बंधवाकर तथा उनके बालकों के लिए जगत –मामा बन जो परिवार –वाद का शिकार मैं हुआ ,मैं उसे राजनीति –प्रेरित समझता हूँ | ‘भूल –चूक लेनी देनी !’
मेरी बात और है ,पर भारतीय राजनीति में ये नए –नवेले रिश्ते स्वागत योग्य हैं ,राजनितिक हलुवाई पके –पकाए व्यंजन खिला कर इन रिश्तों को और प्रगाढ़ करें तथा हम लेखकों को चाशनी उपलब्ध कराते रहें |
Monday, January 16, 2012
झाड़ग्राम , विवेकानन्द और इस्पात |(दैनिक जागरण १८ जनवरी २०१२ को प्रकाशित )
झाड़ग्राम , विवेकानन्द और इस्पात |
१२ तारीख जमशेदपुर के प्लेटफार्म संख्या ४ पर इस्पात एक्सप्रेस के इंतज़ार में अकेले ही बैठा हुआ आती –जाती ट्रेनों का मुआयना कर रहा था |
२-३ घंटे पूर्व ही स्टेशन पर आ जाने के उपरांत आपके पास कुछ ही विकल्प होते हैं , उनमे से एक का प्रयोग करते हुए दूसरे विकल्प को अपने झोले से निकालने का प्रयत्न करने लगा अर्थात मुड़े –तुड़े अखबार के पन्नों को सीधा कर फिर से पढ़ने का |
“दैनिक जागरण” का प्रथम पृष्ठ मुख्य लेख –‘आज से खडगपुर जमशेदपुर रेल लाईन पर परिचालन सुचारू रूप से ,खासकर रात्रि परिचालन’ ,पढकर कुतूहल हुआ जाना मुझे भी खडगपुर ही था ,सहसा झाड़ग्राम की याद तरोताजा हो उठी ,ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसा ...लाशों का मंज़र सब कुछ आँखों के आसपास से जैसे अभी –अभी गुज़रा हो |
मैंने पन्ना बदल डाला और राजनीति ,खेल से बचते –बचाते अंतिम पृष्ठ पर विवेकानन्द जी के जन्मोत्सव पर प्रकाशित परिशिष्ट पर जा पहुंचा ,और मन को झाड़ग्राम से निकालकर स्वामी जी के आस-पास आरोपित करने का प्रयत्न शुरू कर दिया |
भारत की मोहक सांस्कृतिक विरासत और आधुनिंक भारत के प्रलापों गर्वित होता मैं ट्रेन पर बैठ चुका था ,खिड़की के बाहर नजरें टिका लीं|
ट्रेन के छूटते ही इस्पात –संयंत्र के तने हुए चिमनी को देखकर भारत पर इठलाता हुआ ,मैं मन ही मन भारत के विकास में इस्पात की भूमिका के आकलन में जुट गया |
थोड़ी देर में घाटशिला गुज़रा और खनिज संपदाओं से पूर्ण इस देश में चहुँ -ओर विकास ही विकास मुझे आभासित होने लगा ,संस्कृति और विकास का नारा मैंने भीतर ही भीतर बुलंद करना शुरू किया |
स्वप्न टूटा और गाड़ी एक झटके के साथ झाड़ग्राम पर रुकी |प्लेटफोर्म पर २५ –३० सुरक्षा बल ,एक दम मुस्तैद और हर यात्री को घूरते |एक बैनर पर नज़र पड़ी ऊपर ममता जी की तस्वीर ,नीचे एक सुरक्षाबल की जो किसी को सविनय कुछ समझा रहा था ,कुछ सहयात्रियों से इस सन्दर्भ में पूछना भी चाहा ,पर उनकी आँखों में भय के अतिरिक्त और कुछ भी मुझे मिला नहीं |
ट्रेन अब एक स्थल से हो कर तेजी से निकल जाना चाहती थी ,कुछ क्षत- विक्षत डब्बे अभी भी पटरी के एक ओर पड़े थे ,इस्पात के डिब्बे ,इस्पात के क्षत- विक्षत डब्बे .....विकास का ताना –बाना इस्पात अब सामने मुर्दा पड़ा था |
थोड़ी देर पूर्व ट्विट्टर पर सन्देश दिया था -,”स्वामी विवेकानन्द की जन्मस्थली पहुचने पर रोमांच का अनुभव हो रहा है |”
अब मैं भावना –शून्य हो रहा था ,आँखे मूंद ली और सीधे खडगपुर में ही खोल सका |विश्व के सबसे बड़े प्लेटफोर्म ने जैसे मयखाने की तरह फिर से विकास की शराब में मुझे डुबोना शुरू किया ,|सामने इस्पात की सीढियाँ ,इस्पात की कार ,इस्पात के लोग ...........मैं भी इस्पात का |
आई .आई .टी के प्रांगण में पहुँच कर और भी मादक हो उठा ,साक्षात् आधुनिक भारत के विकास में अग्रणी संस्था के सामने खड़ा था |
विवेकानन्द जी के एक विशाल पोस्टर ने रही –सही कसर भी पूरी कर दी ,झाड़ग्राम अब ओझल हो चला था | इस्पात अब हर ओर नज़र आने लगा ,मुझे लगा शायद वह पोस्टर वाला सैनिक उस व्यक्ति को भी इस्पात होने को कह रहा होगा .........!
Tuesday, January 10, 2012
“तीरण से काटे तीर ,तीरण को काटे तीर” (दैनिक जागरण ,१७ जनवरी २०११ में प्रकाशित )
“तीरण से काटे तीर ,तीरण को काटे तीर”
आज सारा दिन यही सोचता रहा की क्या लिखूं ? सारा दोष मीडिया का है ,न उनके पास मसाला था न मेरे पास मसला |तड़का लगाने के लिए पहली शर्त है दाल का होना ,और दाल गलाना मीडिया का विशेषाधिकार है और गाल बजाना हमारा |इस चुनावी चक्कलस में पूरा दिन एक लेखक मुद्दे के अभाव में भटके यह समाज , लोकतंत्र और पत्रकारिता की घोर लापरवाही का सबूत है |
समाज का उत्तर -दायित्व है घटना को अंजाम देना ,लोकतंत्र का दायित्व है घटना स्थल का निरीक्षण करना तथा पत्रकारिता का दायित्व उसे मसाला मिला कर प्रस्तुत करना |लेखक तो निरीह है वह तो बस घर में बैठ कर उन तीनो संस्थाओं को खरी -खोटी सुना सकता है ,अगर घटना न घटे तो साहित्य का विकास अवरुद्ध हो जाये ,अगर अंग्रेज न होते तो हमें मुंशी प्रेमचंद की नब्बे प्रतिशत रचनाओं का रस कैसे मिलता ?अतः आप सबसे हिंदी के उत्थान हेतु आग्रह है ,की घटनाओं के प्रवाह को अवरुद्ध न करें |
घर में दाल -रोटी चलती रहे और संपादक महोदय की कृपा -दृष्टि बनी रहे इस हेतु कल की ही घटना को नयी थाली में परोस रहा हूँ ,कृपया आतिथ्य परंपरा का निर्वाह करते हुए इसे भी उसी सुरुचि -पूर्ण भाव से ग्रहण करें |
कल एक संवैधानिक संस्था ने एक चुनाव चिह्न प्रतीक को लाल कपडे से तथा उस पार्टी के नायिका के प्रतीक को हरे कपडे से ढँक कर जन -जागृति का सूत्रपात कर दिया |
हरेक प्रबुद्ध महानुभावों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये ,एक महोदय ने तो कंगारू को हाथी का विकल्प बताया ,पर समस्या तो वही रह जाएगी , कंगारू के प्रतीक को नीले कपडे का वस्त्र धारण करना पड़ेगा |
एक विकल्प है - प्रतीकों के बजाये प्रत्यक्ष को तरजीह दी जाये और एक संवैधानिक संस्था को दूसरे संवैधानिक संस्था से उलझाया जाये -"विषस्य -विषमोषधम " की तर्ज पर |
उन्होंने हाथी के प्रतीक को ओझल किया आप साक्षात् हाथिओं को सारे शहर में खड़ा कर दें ,अगर उनपर पर्दा डाला गया तो वन्य -प्राणी अधिनियम तथा पशुओं के प्रति क्रूरता का मामला वन- विभाग में दर्ज करा दें ,जब तक चुनाव- आयोग और वन- विभाग आपस में उलझे रहेंगे तबतक चुनावी -बैतरणी पार |
अगर हाथी न मिले उसी कद -काठी के किसी इन्सान को बैठा दें, अगर भूल से भी हाथी को उन्होंने हाजत में बंद किया तो उसके आहार को जुटाने में उन्हें अपना वेतन भी कम पड़ जायेगा मसल है -मरा हाथी भी नौ -लाख का होता है |
फिर भी अगर काम ने बने तो अपने गणेश जी कब काम आयेंगे ,हाथी पर सनातन -पंथीओं की गोष्ठी बुला लें ,बेडा पार |
हाथी से अब हाथ पर आते हैं ,हाथ वालों का तो काम शुरू से ही आसान है ,अपने उद्दंड कार्यकर्ताओं को हर चौक पर हाथ ऊपर कर के खड़ा होने को कहें ,बीच-बीच में पाली बदलते रहें ,कार्यकर्ताओं से भी निपटारा और प्रचार भी,महिला कार्यकर्ताओं का उपयोग जनता को अधिक आकर्षित करेगा ,अगर उनपर पर्दा डाला तो महिला आयोग बिना शिकायत के ही चुनाव- आयोग को अपनी शक्ति का एहसास करा देगी ,हो गया काम आपका |
साईकिल वाले ठीक चुनाव के दिन प्रदुषण -मुक्ति के नाम पर साईकिल दौड़ या साईकिल मैराथन का आयोजन करा दें ,अगर रोक लगायी गयी तो प्रदूषण -नियंत्रण विभाग को सूचित कर दें ,ओलम्पिक एसोसिएसन वैसे भी कॉमवेल्थ के बाद से सुस्त बैठे है , उन्हें पूर्व में ही आमंत्रित कर दें ,दोनों मिलकर चुनाव आयोग की दौड़ लगवा देंगे ,आप का भी भला हो जायेगा |
कमल वाले रातो -रात शहर के हर नाले में कमल के पौधे पुष्प सहित नर्सरी से लाकर लगा दें ,अगर उन्हें हटाया गया तो पर्यावरण मंत्रालय में शिकायत दर्ज करा दें ,या ग्लोबल वार्मिंग का ऐसा बवाल खड़ा करें की जनता को लगे अगर इन फूलों को हटाया गया तो सच-मुच में ही २०१२ में धरती का विनाश हो जायेगा |
इस तरह हर दल की वैतरणी पार हो जाएगी ,बस याद रखें -"तीरण से काटे तीर ,तीरण को काटे तीर “!
Monday, January 9, 2012
टाट के भीतर क्या है?(दैनिक जागरण ११ जनवरी २०१२ को प्रकाशित )
टाट के भीतर क्या है?
आज किसी ने मुझसे मेरी व्यंग शैली में सुधार लाने का विनम्र आग्रह किया ,हालाँकि उनकी विनती की शैली से " सुधर जाओ "की ध्वनि का आभास हुआ , खैर ,मुझे तो थाने के अन्दर साधू ,चोर ,उच्चकों में भी कोतवाल की छवि का ही एहसास होता है और बेटिकट रेल यात्रा के वक़्त हर काले कोट में यमराज का |
उन्होंने तो बस इतना ही कहा की आप "परोक्ष निरूपण" का उपयोग कर अपनी रचनाओं को अधिक प्रभावी बना सकते हैं ,और स्वयं के दीर्घायु होने की कामना कर सकते हैं !
परोक्ष निरूपण का अर्थ है ,किसी व्यक्ति या वस्तु की वास्तविक पहचान को किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के नाम से स्थानांतरित कर अपनी बात को रखना ,अर्थात अगर मुझे आज हाथी की प्रतिमा तो लिखना होगा को बिल्ली की प्रतिमा ,बहन जी की प्रतिमा को मौसी जी की प्रतिमा कहनी होगी |
तो ,आज बिल्ली -मौसी की प्रतिमाओं को आवरण से ढक दिया गया ,कहा गया की चुनाव -आचार संहिता में मतदाता गुमराह हो सकते हैं ,क्योकि मौसी जी की पार्टी का चुनाव चिन्ह है ,बिल्ली |
हो सकता है की हरेक व्यक्ति को दस्ताना पहनना भी अनिवार्य किया जाये क्योंकि एक प्रमुख पार्टी का चुनाव चिन्ह हाथ है ,हाथ और हाथी में केवल एक एक मात्रे का ही फर्क है ,ई लगाने से हाथ हाथी में बदल जाता है ,अतः चुनाव आयोग को हाथ के विषय में भी संज्ञान लेना चाहिए |वैसे अधिकतर लोग हाथ की जगह" पंजा -छाप "को ही कांग्रेस का चुनावचिन्ह मानते आ रहे हैं |शायद हाथ को परोक्ष निरूपण में पंजा कहा जाता हो ,पंजा समानार्थक शब्द है हाथ का ,उदहारण -"ख़ूनी-पंजा "|
एक और संभावना है की मूर्तियों को टाट में लिपटा देख बच्चों की जिज्ञासा प्रबल हो उठे और वो बार -बार वो एक ही प्रश्न कर अपने निरीह माता -पिता को परेशान करें -"टाट की भीतर क्या है ?" और झख मारकर उन्हें बताना पड़े की टाट के भीतर हाथी नहीं बिल्ली है |
लेकिन बाल-सुलभ चंचलता अनुपूरक प्रश्न भी कर सकती है की -इसे छुपा कर क्यों रखा गया है ,रामचंद्र जी ने भी चंदा मामा को लेकर ऐसा उत्पात मचाया की माता कौशल्या को दर्पण में चाँद को उतारना पड़ा ,लेकिन वो त्रेता युग था रामचंद्र जी को बहलाना आसान था . अब तो बच्चे ऐसे सीधे नहीं ,वो बिना देखे मानने वाले नहीं की असलियत क्या है हाथी या बिल्ली ,और उसे क्यों छुपाया जा रहा है ?
अगर उन्हें बताया गया की बिल्ली तुम्हे काट न ले इसीलिए उसे छुपा दिया गया है तो वे यह भी पूछ सकते हैं की फिर उन्हें जगह -जगह पर लगाया ही क्यों गया ?
जब हर घर में ऐसे प्रश्न उठेंगे तो जिसे नहीं भी मालूम होगा उन्हें भी बिल्ली के विषय में पता चल जायेगा ,और यह भी भी" हाथी -बिल्ली , हाथी -बिल्ली" एक नारे के रूप में लोगों के अवचेतन मन में न बैठ जाये और कहीं गलती से न चाहते हुए भी उसी चिन्ह पर मतदान कर दें ,गणित में कमजोर विद्यार्थी परीक्षा में वही लिखता जो गेस पेपर से कुछ देर पूर्व ही रटा हो ,बेचारे को आंकड़ा बदलना भी नहीं आता |
हो सकता हो सर्दिओं का ख्याल कर उन जीव प्रतिमाओं को टाट से लपेटा गया हो ,जैसे द्वारिकाधीश को हर मौसम के अनुपूप "श्रृंगार और वस्त्र " |
सारांश यह की टाट के भीतर परोक्ष निरूपण के चक्कर में अणु -बम को तो निरुपित नहीं कर दिया गया -और कहीं मतदान पेटी से "जिन्न "न निकल पड़े |
विश्व की सबसे खूबसूरत प्रतिमाओं में शुमार बहन जी की प्रतिमा और उनकी सवारी प्रतिमा को सांस्कृतिक जिज्ञासु जनों के आँखों से दूर रखना सांस्कृतिक अपराध है !अतः देर न हो जाये वर्ना पता चल जायेगा" टाट के भीतर क्या है" ?
Saturday, January 7, 2012
'विश्व हिंदी नौटंकी'
'विश्व हिंदी नौटंकी'
"विश्व हिंदी दिवस" में तीन दिन शेष है , अर्थात १० जनवरी २०१२ को "वैश्विक हिंदी नौटंकी" के सञ्चालन का मंच लगभग तैयार है , पात्रों ने भी अपने -अपने संवादों को खरीदना प्रारंभ कर दिया है ,और हमारे जैसे काम-चलाऊ लेखकों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने के संकेत दिखलाई देने लगे हैं |
इतनी जानकारी आप तक पहुचाने के बाद भी एक महत्वपूर्ण सूचना आप तक न पंहुचा -पाने का खेद है ,आयोजन -स्थल की कोई सूचना मेरे पास उपलब्ध नहीं है ,वैसे भी किसी समारोह के आयोजन -स्थल से मेरा प्रयोजन सीमित ही रहा है - "मोको कहाँ सीकरी सों काम "|
मेरे जैसे कई और भी फुटकर लेखक हैं , जो सत्ता -प्रतिष्ठान के आयोजनों और प्रशस्ति -पत्रों से दूर रह कर साहित्य की सेवा करना अपना परम -धर्म मानते हैं ,हालाँकि इस तपस्या को सफलीभूत करने का श्रेय मुख्यतः 'समारोह -आयोजन -समीति 'को अधिक दिया जाना चाहिए जो हमारे जैसे लेखकों का नाम आमंत्रण -पत्र पर अंकित करना अक्सर भूल जाते हैं |
' जेपी आन्दोलन और इंदिरा विरोध' की आड़ में यह गुरु -मंत्र कई साहित्य -विभूतिओं ने अपनाया है ,'महादेवी जी 'और' बाबा नागार्जुन 'ने तो सचमुच में ही 'इंदिरा जी 'के हाथों से पुरस्कार लेना अस्वीकार कर दिया ,ये और बात है की गरीब लेखकों के लिए ट्रस्ट स्थापना हेतु 'महादेवी जी 'ने बाद में उन्ही के हाथों से पुरस्कार ग्रहण किया ,और 'बाबा नागार्जुन' ने आन्दोलन के दौरान अपने साथ बंद समाजवादियों को जेल से बाहर आकर "वेश्या -दल " के उपनाम से सुशोभित किया !
कई साहित्यकारों ने इस पर खूब बवाल कटा की महादेवी जी ने इंदिरा जी के हाथों से पुरस्कार क्यों ग्रहण किया ,अर्थात उन्हें चेक से या मणि-आर्डर से पुरस्कार लेना चाहिए था ,परन्तु उन हाथों से नहीं |
एक प्रमुख साहित्यकार जिनका तकिया -कलाम "मैं हिंदी का ग्रीब लेखक हूँ " रहा हालाँकि दिल्ली में उनके फार्म -हाउस रंगीन शामों के लिए मशहूर रहा ,ने तो इस व्यथा से विश्व -हिंदी -सम्मलेन का बहिष्कार तक कर डाला |अंग्रेजी अख़बारों ने इस प्रकार प्रकाशित किया –“He broke down on stage “
आगामी १० तारीख को भी हिंदी की दुर्दशा पर आंसू बहाए जायेंगे ,हिंदी को विश्व -पटल पर लाने की कसमे खायी जाएँगी ,भले ही हिंदी को अपने देश में भी कोई विशेष -दर्जा हासिल न हो ,पर संयुक्त -राष्ट्र में आधिकारिक दर्जा दिलाने की मांग की जाएगी |
सारे हिंदी भक्त इस बात पर सहमत दिखेंगे की हिंदी को पढाई के माध्यम में प्रयोग किया जाये ,हालाँकि खुद उनके ही बच्चों का दाखिला और परवरिश अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही होती आ रही है |
आयोजन स्थल का तो पता ठीक से ज्ञात नहीं है ,लेकिन कई सालों से 'मारीशस या फिजी' में समारोह का आयोजन होता आ रहा है ,तर्क यह दिया जाता है की वहाँ हिंदी की जड़ें भारत से जुडी है ,जबकि वहाँ मात्र एक प्रतिशत से भी कम लोगों को हिंदी की जानकारी है |
दोनों देश प्रमुक पर्यटन स्थल हैं ,तो उनका चयन केवल चमचों और चाटुकारों को प्रकृति -दर्शन के हितार्थ होता आ रहा है |
लिखते -लिखते दिन बदल गया ,तो मात्र दो दिन और इंतजार कीजिये 'विश्व हिंदी नौटंकी "की .........!
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