Tuesday, June 20, 2017

सृजक

डॉ.आलोक रंजन|[[

कड़ी शीर्षक

== सृजक = पथराई आँखों के भीतर वह भाव ढूँढता फिरता है , मृदा शिला में भी जीवन का आधार ढूँढता रहता है |

कवि हो या हो कृषक ,मरुभूमि हो या हो मिथक , निर्विकार को आकार-बंध,शिल्पी की निजता है |

मेरे ही गीतों की धुन पर केशव तुमने रास रचाया , मेरे ही कपास के सूतों से तुमने कृष्णा की लाज बचाया |

उसी चीर के आँचल को बेच –बेच मैंने ब्याज चुकाया , बुरा न मानो माधव ! तुमने मित्रता धर्म नहीं निभाया|

तुम स्रष्टा हो ,तुम हो पूजित ,माखन पर अधिकार तुम्हारा , तुम संबल हो ,कभी शेष को ,और कभी भूधर को क्षत्र बनाया |

माता का लहू पीकर हमने मुरलीधर ,गोवर्धन को मूर्त उतारा, भूख से मेरा बालक तरसे ,तुमने छप्पन भोग लगाया ?

माना तुम लीलाधर हो,अंतर्यामी! जग भी तेरी माया है , तेरे दीप-पात्र में जलता मेरा लहू क्यों है ,गलती मेरी काया है?

तुम हो स्रष्टा ,लक्ष्मीपति तुम ,महलों के अधिकारी हो , मैं हूँ सृजक धान्य-धन का नहीं ,बस सपनों का व्यापारी हूँ |

कभी सूर बन अन्ध कूप से मैंने तेरा ही गान किया , मीरा बन कभी ,मुरारी!,हलाहल का पान किया |

ठाकुर!बाल-सखा के लाए धान्य ,जिसने स्वयं ब्रह्म को तृप्त किया , उसे उगाने हेतु हमने ,ह्रदय चीर अपने लहू कोष को रिक्त किया | 

समर मध्य जब पृथा –पुत्र क्लीव सा मोह –पाश में भरमाया , क्षात्र धर्म रक्षित करने हित,मोह –बंध खंडित करने हित –

मोहन! तुमने धर्म-नीति रक्षा हेतु ,भारत को विश्वरूप था दिखलाया| सरसों के पीले फूलों में ,उसे देखता रहता मैं नित |

भूमंडल को अपनी इच्छा से तुमने युगों-युगों अगिनत बार बसाया है , वासुदेव!गीली मिट्टी में तुम्हे,बसाने शिल्पी ने ,अविरल चाक घुमाया है ! 

सृष्टि का संहार-सृजन तुम्हारी माया के आधीन,निजता का संचार मात्र , मिट्टी को सिंचित करता मेरा लहू–स्वेद,तपने की अग्नि- भूखे-बच्चों का करुण आत्र|

सृजक और स्रष्टा(द्वितीय आयाम )

== सुवामा ==
सुवामा शक्ति स्वयं ,या किसी अपर शक्ति के आधीन ? हे राम! जनक-सुता का सार्वभौम से यह प्रश्न अति प्राचीन !

नारी मात्र कौशल्या हो या स्वयं ब्रम्ह की छाया? युगों-युगों से जलती आयी वैदेही की काया !

मायापति को मूर्त रूप देती जिस नारी की कोख | आश्रय होता उसका स्वयं निविड़ वाटिका अशोक !

रावण के कृत्यों का अबला क्यों अपराध सहे? अग्निसाक्षी निरपराध क्यों अग्नि-देव के चरण गहे?
विलासी इंद्र के अपकर्म से अहिल्या आज भी स्तब्ध है | शील न लुट जाये ,इस भय से मानवी शिला बनी निःशब्द है|

लक्ष्मण रेखा के आगे लांछा की ज्वाला है ,भीतर है धर्म प्रलाप, 
जलती केवल नारी ,भीतर –बाहर उस रेखा करती विह्वल रौद्र अलाप|
भरी सभा में अग्नि-प्रगटा धर्मराज का व्यसन मोल चुकाती है, पुरुषोत्तम की मर्यादा हित भू-कन्या भूमि का आश्रय पाती है|
कुरुभूमि में पार्थ प्रिय गाण्डीव जिसकी प्रत्यंचा थी पांचाली के केश, भीम सना था रक्त सुज्जजित ,पांचाली से अधिक उसे था कुल –मर्यादा का क्लेश |
पांडू-सुतों को सुयोधन ,अगर समर्पित कर देता पांच गाँव | उन्हें सताती याद कहाँ पांचाली के ह्रदय के हरे घाव |
रुधिर पिला कर पालन करती लघुता को सुवरिष्ट,तब स्रष्टा पूजे जाते हैं | सृजक जब सितकेशी हो ,प्रवया हो ,साकल्य छीन अंचल का न्यास चुकाते हैं !

सृजन

डॉ.आलोक रंजन|[[

कड़ी शीर्षक

== सृजक = पथराई आँखों के भीतर वह भाव ढूँढता फिरता है , मृदा शिला में भी जीवन का आधार ढूँढता रहता है |

कवि हो या हो कृषक ,मरुभूमि हो या हो मिथक , निर्विकार को आकार-बंध,शिल्पी की निजता है |

मेरे ही गीतों की धुन पर केशव तुमने रास रचाया , मेरे ही कपास के सूतों से तुमने कृष्णा की लाज बचाया |

उसी चीर के आँचल को बेच –बेच मैंने ब्याज चुकाया , बुरा न मानो माधव ! तुमने मित्रता धर्म नहीं निभाया|

तुम स्रष्टा हो ,तुम हो पूजित ,माखन पर अधिकार तुम्हारा , तुम संबल हो ,कभी शेष को ,और कभी भूधर को क्षत्र बनाया |

माता का लहू पीकर हमने मुरलीधर ,गोवर्धन को मूर्त उतारा, भूख से मेरा बालक तरसे ,तुमने छप्पन भोग लगाया ?

माना तुम लीलाधर हो,अंतर्यामी! जग भी तेरी माया है , तेरे दीप-पात्र में जलता मेरा लहू क्यों है ,गलती मेरी काया है?

तुम हो स्रष्टा ,लक्ष्मीपति तुम ,महलों के अधिकारी हो , मैं हूँ सृजक धान्य-धन का नहीं ,बस सपनों का व्यापारी हूँ |

कभी सूर बन अन्ध कूप से मैंने तेरा ही गान किया , मीरा बन कभी ,मुरारी!,हलाहल का पान किया |

ठाकुर!बाल-सखा के लाए धान्य ,जिसने स्वयं ब्रह्म को तृप्त किया , उसे उगाने हेतु हमने ,ह्रदय चीर अपने लहू कोष को रिक्त किया | 

समर मध्य जब पृथा –पुत्र क्लीव सा मोह –पाश में भरमाया , क्षात्र धर्म रक्षित करने हित,मोह –बंध खंडित करने हित –

मोहन! तुमने धर्म-नीति रक्षा हेतु ,भारत को विश्वरूप था दिखलाया| सरसों के पीले फूलों में ,उसे देखता रहता मैं नित |

भूमंडल को अपनी इच्छा से तुमने युगों-युगों अगिनत बार बसाया है , वासुदेव!गीली मिट्टी में तुम्हे,बसाने शिल्पी ने ,अविरल चाक घुमाया है ! 

सृष्टि का संहार-सृजन तुम्हारी माया के आधीन,निजता का संचार मात्र , मिट्टी को सिंचित करता मेरा लहू–स्वेद,तपने की अग्नि- भूखे-बच्चों का करुण आत्र|

सृजक और स्रष्टा(द्वितीय आयाम )

== सुवामा ==
सुवामा शक्ति स्वयं ,या किसी अपर शक्ति के आधीन ? हे राम! जनक-सुता का सार्वभौम से यह प्रश्न अति प्राचीन !

नारी मात्र कौशल्या हो या स्वयं ब्रम्ह की छाया? युगों-युगों से जलती आयी वैदेही की काया !

मायापति को मूर्त रूप देती जिस नारी की कोख | आश्रय होता उसका स्वयं निविड़ वाटिका अशोक !

रावण के कृत्यों का अबला क्यों अपराध सहे? अग्निसाक्षी निरपराध क्यों अग्नि-देव के चरण गहे?
विलासी इंद्र के अपकर्म से अहिल्या आज भी स्तब्ध है | शील न लुट जाये ,इस भय से मानवी शिला बनी निःशब्द है|

लक्ष्मण रेखा के आगे लांछा की ज्वाला है ,भीतर है धर्म प्रलाप, 
जलती केवल नारी ,भीतर –बाहर उस रेखा करती विह्वल रौद्र अलाप|
भरी सभा में अग्नि-प्रगटा धर्मराज का व्यसन मोल चुकाती है, पुरुषोत्तम की मर्यादा हित भू-कन्या भूमि का आश्रय पाती है|
कुरुभूमि में पार्थ प्रिय गाण्डीव जिसकी प्रत्यंचा थी पांचाली के केश, भीम सना था रक्त सुज्जजित ,पांचाली से अधिक उसे था कुल –मर्यादा का क्लेश |
पांडू-सुतों को सुयोधन ,अगर समर्पित कर देता पांच गाँव | उन्हें सताती याद कहाँ पांचाली के ह्रदय के हरे घाव |
रुधिर पिला कर पालन करती लघुता को सुवरिष्ट,तब स्रष्टा पूजे जाते हैं | सृजक जब सितकेशी हो ,प्रवया हो ,साकल्य छीन अंचल का न्यास चुकाते हैं !

Tuesday, December 22, 2015

                                                    असहिष्णुता

असहिष्णुता
वैधानिक चेतावनी : मेरे लेख को पढ़ कर आप असहिष्णुता के शिकार हो सकते हैं ,अगर आपको कोई सम्मान मिला हुआ है तो मेरे लेख को पढ़ कर उसे वापस करने या ना करने की जिम्मेदारी पूर्णतः आपकी है ,मुझे तो आजतक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक एक पेंसिल भी पुरस्कार में प्राप्त नहीं हुआ है अतः मैं असिष्णुता का सबसे बड़ा शिकार होते हुए भी कुछ लौटा तो सकता नहीं |

                            खैर,मुद्दा यह है की एक शब्द जिसका अर्थ भी कई लोगों को शायद ही पता होगा ,खान साहब और अन्य बुद्धिजीवियो ने उसे संक्रामक बीमारी की तरह सबकी जुबान पर फैला दिया ऑक्सफ़ोर्ड डिक्सनरी में असहिष्णुता शब्द को जोड़ देना चाहिए |मैं खुद कई चीज़ों में असहज महसूस करता हूँ वह असहिष्णुता है या नहीं आप तय करके मुझे बतायें|

१)मैं कद काठी से श्री गणेश करता हूँ मेरी कद काठी भी गणेश जी जैसी ही है अगर मैं रेल में सफ़र करता हूँ तो पूरा बर्थ मेरे पालथी मारने से भर जाता है अगर कोई और व्यक्ति उस बर्थ पर बैठना चाहे तो मैं असहिष्णु हो जाता हूँ और मेरी कमरे छमाप्रार्थी कमर का झेत्रफल साथ बैठने वाले को असहिष्णु कर देगा |रेल मंत्रालय हमारे जैसे लोगों के लिए अलग व्यवस्था करे अन्यथा मैं असहिष्णु हो जाऊंगा |

२)मैं आहार चार वयक्तियो के बराबर लेता हूँ ,भगवान को सुबह शाम एक पाव घी से बना भोग अर्पित करता हूँ और प्रसाद अकेले खा जाता हूँ अगर परिवार के लोग उसमे हिस्सा मांगते हैं तो मैं असहिष्णु हो जाता हूँ क्योंकी मेरा मानना है की श्रधा व्यक्तिगत होती है |

३)भोजन के पहले २ गिलास बूटी छान कर पीता हूँ बम भोले के नाम पर ,अगर बिहार सरकार पूर्ण नशाबंदी करती है तो असहिष्णु होकर मिल्क बार के सामने धरना दे कर बैठ जाऊंगा और शराब बेचने वालों को जब दूध बेचना पड़ेगा तो वे भी असहिष्णु हो जायेंगे |

४)अगर शराब की सारी दुकानों में दूध बिकने लगेगा तो दूध की नदियों से बाढ़ आ जाएगी ,फिर गणेश जी को दूध पिलाना पड़ेगा वह भी हर रोज़ ,ज्यादा दूध पीने से गणेश जी भी असहिष्णुता के शिकार बन जायेंगे और रोज़ दूध पिलाने से भक्त भी असहिष्णु हो जायेंगे |

५ )पहले मैं अपने पुत्रों को नालायक समझता था ,लालू जी के उच्च शिक्षा प्राप्त पुत्रों को देखकर इसलिए असहिष्णु हो गया की नालायक या लायक पिता होता है पुत्र नहीं ,अपने पुत्रों को पढ़ने के लिए जो डाट फटकार लगाता उससे वे असहिष्णु हो जाते होंगे |
                                   मेरे इस लेख को पढ़कर अगर आप असहिष्णु हो गए हों तो छमा करें परन्तु एक लेखक को मुद्दा तो चाहिए जिससे प्रकाशक महोदय की कृपा दृष्टि मुझ पर बनी रहे अन्यथा हिंदी के लेखक को सच में असहिष्णुता होती है क्योकि लोग हैरी पोर्टर खरीदने की लिए कतार में खड़े रह सकते हैं परन्तु हिंदी साहित्य को लोग अपने स्टेटस सिम्बल की चिंता में नहीं खरीदते हैं |

Tuesday, September 23, 2014

एक भारत ,श्रेष्ठ भारत

शक्ति ऐसी है नहीं संसार में कोई कहीं पर, जो हमारे देश की राष्ट्रीयता को अस्त कर दे । 
ध्वान्त कोई है नहीं आकाश में ऐसा विरोधी, जो हमारी एकता के सूर्य को विध्वस्त कर दे !

राष्ट्र की सीमांत रेखाएँ नहीं हैं बालकों के खेल का कोई घरौंदा, पाँव से जिसको मिटा दे ।
देश की स्वाधीनता सीता सुरक्षित है, किसी दश-कंठ का साहस नहीं, ऊँगली कभी उसपर उठा दे ।

देश पूरा एक दिन हुंकार भी समवेत कर दे, तो सभी आतंकवादियों का बगुला टूट जाए । 
किन्तु, ऐसा शील भी क्या, देखता सहता रहे जो आततायी मातृ-मंदिर की धरोहर लूट जाए ।

रोग, पावक, पाप, रिपु प्रारंभ में लघु हों भले ही किन्तु, वे ही अंत में दुर्दम्य हो जाते उमड़कर । 
पूर्व इस भय के की वातावरण में विष फैल जाए, विषधरों के विष उगलते दंश को रख दो कुचलकर ।

झेलते तूफ़ान ऐसे सैकड़ो आए युगों से, हम इसे भी ऐतिहासिक भूमिका में झेल लेंगे । 
किन्तु, बर्बर और कायरता कलंकित कारनामों की पुनरावृति को निश्चेष्ट होकर हम सहेंगे ।

प्रेम वीणा

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ,
मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ|

मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में,
तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ|

बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से,


विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ|

खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें,
जगत में खोजता व्याकुल किसी का प्यार मैं भी हूँ|

कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में,
प्रतिक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ|


सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर,
विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ|

Wednesday, July 31, 2013

प्रेमचंद और आधुनि हिंदी का विकास

प्रेमचंद और आधुनि हिंदी का विकास

प्रेमचंद ,मुंशी जी ,नवाब राय ,धनपत राय आप चाहे जिस नाम से भी कलम के इस जादूगर को याद करें उनके कथ्य और कथानक आपके आस पास ही विचरण करती नज़र आएगी | हल्कू और गोबर जैसे पात्र अभी भी गाँव की तंग गलियों में किसी साहूकार से ब्याज मांगते निर्विकल्प भाव में मिल जायेंगे|

        मिस्टर मेहता का फिटन अब बड़ी गाड़ियों में बदल गया है ,पर खुद मिस्टर मेहता नहीं बदले ,वो अब जमींदारों की ग्राम्य नाटकों की जगह रोटरी या लायंस क्लब में जाम चढाते अनिवार्य रूप से मिल जायेंगे | मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिगता का कोई पैमाना आज तक बना ही नहीं है शायद ,मुंशी जी पराधीन भारत में स्वतंत्र लेखक बने रहे और उनकी रचनाओं की ताज़गी जस की तस बनी हुई है |

              मुंशी जी ने अपने जीवन काल  में दो तरह की क्रांतियों का सूत्रपात किया ,पहला की उन्होंने भाषा को संवाद का विषय के रूप देखा विवाद के रूप में नहीं ,उर्दू से अपनी रचनाओं का सूत्रपात कर तथा उसमे राष्ट्रवादिता को प्रमुखता से स्थान देकर उन्होंने जो अपनी छवि बनायी जो आज भी नए रचनाकारों के लिए मील का पत्थर है ,आप सोजे वतन को पढ़ें या मानस की किसी श्रृंखला को भाषा मात्र संवाद तक सीमित हो कर रह गयी और कथ्य का आशय दीर्घ और सुदीर्घ होता चला गया |
                       वास्तव में प्रेमचंद जी की अपनी ही एक भाषा है ,अपनी ही एक शैली है ,उर्दू और हिंदी दोनों को प्रेमचंद ने अपनी कलम से एक नया विस्तार दे डाला |

                 मुख्यत: प्रेमचंद जी की रचनाएँ ग्राम्य परिवेश में सिमटी ज़रूर थीं पर उनकी भाषा का विस्तार प्रगाढ़ था |जहाँ ज़रुरत हुई ग्राम्य शैली में उनके कथानक बात करते आये ,जहाँ ज़रुरत हुई मौलवी  साहब उर्दू में शराबबंदी के लिए शेखू को दीन का वास्ता देते नज़र आये वहीँ पंडित जी घीसू को शराब की जगह चरणामृत लेने को प्रेरित करते दिखे |

                    वास्तव में हिंदी का पूरा विस्तार हमें मुंशी जी के गद्यों में देखने को मिल जाती है ,न संस्कृत निष्ठ न उर्दू निष्ठ ,भाषा सहज ,सरल और सुग्राह्य ...... 
            उस वक्त चल रहे स्वाधीनता आन्दोलन ने तो उनपर प्रभाव डाला ही उसके सामानांतर सामाजिक आन्दोलनों को प्रेमचंद जी ने अपनी आवाज़ दी , जाती आधारित वर्ण व्यवस्था का शिकार बना हल्कू चमार ,जो अपने देव तुल्य पंडित जी को प्रसन्न करने के लिए अपनी जान तक दे देता है ,और उसके देवता उसके पैरों में रस्सी बांध उसके मृत शरीर  जानवर सरीखे खींच गावं के बाहर ले जा कुत्तों का आहार बना देते हैं |

                    प्रेमचंद जी को शायद आभास भी न रहा हो की स्वतंत्रता के बाद भी उनका चमार पंडितों की दुआओं से जीवित बचा रहेगा |अंत में यह लिखना की उनके कथानक अब भी उतने ही प्रासंगिक हैं ,मुझे खुद ही मर्माहत किये जा रहा है .........बरबस |
                      प्रेमचंद ने अपने कहानियों में अपनी और हम सब साहित्यकारों की पीड़ा बार बार उजागर की ,नए तालीम और सभ्यता वाले युवक अब हिंदी को कुत्सा की नज़र से देखते थे उस ज़माने में भी और अब भी , मेरे लिए हिंदी का तात्पर्य स्वदेशी बोली से है | हम हिंदी वाले मोर्डन बन ही नहीं सके |

                    हिंदी के लेखक को उन्होंने मिल का मजदूर कहा ,जिसके पास चाय के पैसे भी नहीं होते पर उसमे आत्मस्वाभिमान इतना भरा होता है की राजाजी के उस अनुरोध को वह ठुकरा देता है ,जहाँ उसे मिटों के हिंदी अनुवाद को अपना बना कर पेश करना था और विलायती साहित्य की तारीफ करने वाली सभ्य मंडली की हाँ में हाँ मिलाना होता |

                मिल के मजदूर तो अब भी जीवित हैं और आत्मस्वाभिमान के सिवा कुछ और मिला भी नहीं उन्हें ,प्रेमचंद के लेखकों की रचनाएँ प्रकाशकों के वहां से घूम कर वापस चली आती थीं ,अब भी आती हैं पर स्वाभिमान है की ‘थ्री सम इडियट ,’ जैसी जोरदार नामांकरण करने से बचते आ रहे हैं | आधुनिक हिंदी प्रेमचंद से आगे बढ़ ही नहीं पाई ,खास कर गद्य विधा ,यह लिख कर संवाद को अंत करना कितना दुखद है .... उसकी पीड़ा कोई मुझसे पूछे ....................

Tuesday, July 30, 2013

भविष्य का भारत

भविष्य का भारत


भारत ,विश्वगुरु भारत ,प्रभारत भारत जिस पर हम सभी भारतवासी गौरव का नुभव करते हैं ,उसकी संस्कृति और सभ्यता उन्ती ही दीर्घ है जितनी की उसकी सीमा रेखा | हमें भारतवर्ष हमारे पुरखों की विरासत के रूप में मिला और उस विरासत को आने वाली पीदियों को किस रूप में देंगे बहुत कुछ हम पर निर्भर है |
                                        इतिहास स्वयं हमसे प्रश्न करेगा और और उसका उत्तर देना सहज नही होगा |
आज भारत को जिस रूप में हम देख रहे हैं ,जहाँ स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी गरीबों को दो जून की रोटी नसीब नहीं ,उद्योग धंधों पर ताले लग रहे हैं ,भ्रष्टाचार का दानव पुरे देश को निगले के लिए बेताब है ,आतंरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा दोनों पर गंभीर प्रश्न हर दिन उभर कर सामने आ रहे हैं , उर्जा की कमी से निवेशकों का भारत से विश्वास उठ चूका है ,रूपये की गिरते स्तर ने लगभग राष्ट्रीय संकट सी स्थिति उत्पन्न कर दी है | आज से मात्र दस वर्ष पूर्व NDA के शासन काल में महंगाई दर ४ प्रतिशत सकल घरेलु और उत्पाद ८ प्रतिशत था आज इसके ठीक उलट महंगाई दर ८ प्रतिशत और सकल घरेलु उत्पाद ४ प्रतिशत है | देश के एक हिस्से में बाढ़ और दुसरे हिस्से में सुखाड की नौबत है |

इन सब ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर एक ही हैं ,कांग्रेस की सरकार के पास नीतियाँ लगभग हैं ही नहीं ,उनकी नीतियाँ भ्रष्टाचार को छुपाने और साम्प्रदायिकता का राग अलापने के सिवा और कुछ भी नहीं |अगर सुप्रीम कोर्ट . कैग आदि संवैधानिक संस्थाए न होती तो भारत का पुनरुथान असंभव हो गया होता ,इस सरकार ने संवैधानिक संश्थाओं की मर्यादा को भी तार तार कर दिया |
अब प्रश्न यह है भारत के भविष्य में हमारी और आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए ,इसके लिए हमें नीतियों का पुनर्निर्धारण करना होगा ,भागीरथ प्रयास करने होंगे ,हमें ररत और दिन का फर्क भूल कर एक इमानदार पहल करनी होगी |
मैं कुछ नीतियों का जिक्र करना चाहूँगा जो भारत के भविष्य को निर्धारित करने में महती भूमिका का निर्वहन करेंगी |

१) नदियों को जोड़ने की पहल – हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी की इस महत्वाकान्छी प्ररियोजना का सीधा लाभ कृषि को तो मिलता ही साथ ही भारत अकाल और बाढ़ जैसी विभीषिका से झूझता नहीं ,नदियों का जल समुद में न जाकर किसानों के खेत में पहुचता और सिंचाई में खर्च होने वाले उर्जा की बचत सुनिश्चित होती ,हमें तय सीमा में इस परियोजना के बारे में सोचना होगा |

२) मनरेगा को नया आयाम – मनरेगा में बहुघा Unskilled श्रम का उपयोग होता आ रहा है ,श्रमिक बंधुआ मजदूर की तरह कार्य कर करे हैं ,अगर काम की आवादी में ही उन्हें Skill की ट्रेनिंग दी जाती तो उनके और देश के हालत कुछ और होते |

३) भ्रष्टाचार पर नकेल – CBI को स्वायत कर एक हद तक भ्रष्टाचार पर नकेल लगा सकते हैं ,लेकिन सबसे ज़रूरी शर्त होगी पारदर्शिता , और सरकारी कार्यों की तय बद्ध सीमा | कालेधन पर श्वेत पत्र जारी कर उन नामो को उजागर करना जिन्होंने कालाधन छुपा रखा है और सरकार उनका खुलासा नहीं कर रही |

४) उर्जा के क्षेत्र में क्रांति – भारत के पास विशाल सागर सीमा है अगर हम पवन उर्जा का सही इस्तेमाल करें जैसा की गुजरात में हुआ है तो भारत को क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने से कोई रोक नहीं सकता ,हर घर में बिजली ,हर उद्योग को बिजली जिसकी लागत शुन्य होगी ,उर्जा के बिना निवेश और रोज़गार की बात करना बेमानी है |

५) शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार – हमारे शिक्षा प्रणाली रोजगार के अवसर प्रदान करने वाली हो ,यह कार्य पश्चिम की नक़ल के बगैर किया जा सकता है|


६) सुरक्षा प्रणाली का विस्तार – जब हमारे वैज्ञानिकों के पास परमाणु तक की स्वदेशी निर्भरता है तो उन्हें प्रोत्साहित कर एक ऐसी निति का निर्माण काना होगा की आयुध की विदेशी निर्भरता खत्म हो ,आतंकवाद को यह सर्कार जिस तुष्टिकरण की निति से देख रही है उसका परिणाम घातक ही निकला ,पोट| जैसे कानूनों को फिर से वापस लाना होगा , नौ सेना को और मज़बूत बनाना होगा |


७) महिलाओं के सुरक्षा के कठोर क़ानून – बलात्कार जैसे बढती हुई घटनाओं को रोकने के लिए मृत्युदंड का प्रावधान हो तथा अश्लील साइट्स पर निषेध हो ,महिलाओं की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चचित करने के लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाने पर विचार हो |

८) आम नागरिकों से सीधा संवाद – गुजरात की तर्ज पर आम नागरिकों से सीधा संवाद होना चाहिए |

मेरे मत से नीतियों का सही सञ्चालन और स्पस्ष्ट रोड मैप से हम भविष्य के भारत को अपनी आने वाली पीदियों को सौपने में सदा गर्व का अनुभव करेंगे | आज का वर्तमान कल का भविष्य निर्धारि
त करेगी |

Monday, January 28, 2013

“साईंकोपैथ एक पहेली”- ‘हल ढूँढती क्रमिक विकास मनोविज्ञान ‘


अनायास एक दिन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में घटित बहुचर्चित सामूहिक बलात्कार की घटना के परिपेक्ष्य में एक पत्रकार ने मुझसे सीधा सवाल किया की मनोचिकित्सक होने के नाते आप यह बतलाएं की बलात्कार करते वक़्त बलात्कारी के मन में क्या चल रहा होता है ?

                     प्रश्न बड़ा सीधा था ,परन्तु न केवल मैं अपितु मेरे साथ बैठे सहयोगी मनोचिकित्सक के लिए भी उत्तर उतना ही जटिल |अगले दिन मेज़ पर एक मनोवैज्ञानिक का लेख पड़ा देखा ,जिसका शीर्षक लगभग वही प्रश्न था ,एक कौंध या उत्कंठा के वशीभूत उस लेख की पड़ताल करता उत्तर की तलाश करने लगा |

                       मूलतः उस लेख में त्वरित आवेग ,सेक्सुअल डिसऑर्डर ,समाज का बदलता परिवेश ,मादक पदार्थों का बढता चलन आदि को उत्तरदायी बतलाया गया था परन्तु प्रश्न अभी भी जस का तस बना रहा तथा और भी पूरक प्रश्नो की स्वाभाविक प्रकिया ने इसे समस्या-पूर्ति सा जटिल बना दिया |

                  यह ठीक है की त्वरित आवेग, सेक्सुअल डिसऑर्डर ,समाज का बदलता परिवेश ,मादक पदार्थों का बढता चलन बलात्कार और अन्य जघन्य घटनाओं के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं और भी कई कारक को इन घटनाओं से जोड़ कर देखा जा सकता है लेकिन मूल प्रश्न तो बलात्कार करते वक़्त बलात्कारी की मनोदशा का है |

                   प्रश्न और भी उभरते की ऊपर उल्लेखित मानसिक बीमारियाँ एक जनसँख्या समूह को ही अधिक क्यों प्रभावित करती हैं और एक पृथक जम्संख्या समूह को नहीं |
                   अब तक के शोध पत्रों में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति की अनुवांशिक संरचना और परिवेश को इसका उत्तरदायी मन है परन्तु ‘नेचर बनाम नर्चर,’ अभी भी विवादित है ,सीधे शब्दों में अनुवांशिक संरचना या  परिवेश इन दोनों में कौन व्यतित्व निर्माण में उत्तरदायी हैं समझना अभी भी कठिन कार्य है ,जुड़वाँ बच्चों पर दो विपरीत एवं सामान परिवेश में परिक्षण हो चुके है परन्तु न तो शारीरिक न ही मानसिक संरचना के विकास पर इनका सीधा असर साबित किया जा सका |

                     जहाँ तक सांस्कृतिक गिरावट या यूँ कहें की समाज का बदलता परिवेश इन मानसिक अपराधों के लिए उत्तरदायी ठहराए जा रहे हैं तो मेरे लिए यह तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि केवल एक जनसँख्या समूह के लिए ही तो सांस्कृतिक गिरावट हुई नहीं होगी और न ऐसी घटनाएँ पश्चिमी देशों में बहुतायत मिलती हैं जिन्हें हम उस गिरावट के लिए भरसक कोसते रहते हैं |

            उस मूल प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए मनोचिकित्सा विभाग की कई शाखाओं को जोड़कर देखना ही पड़ेगा ,किसी एक विभाग के अध्ययन से समस्या-पूर्ति संभव नहीं |

                  सबसे पहले अपराध विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है | अपराध विज्ञान ऐसी विकृत मानसिकता के व्यतित्व को साईंकोपैथ या खंडित व्यतित्व के रूप में परिभाषित करती है यह ऐसी मानसिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपराध की प्रति आकर्षित होता है तथा अपराध ही उसके जीवन का मकसद या प्रेरणा बन जाती है ,इस अवस्था का उम्र से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है |

                     सामान्यत: मनोचिकित्सक इस अवस्था को अन्य मानसिक विकारों से जोड़ कर देखते हैं या अन्य मानसिक विकारों की वृद्धि को ही विकृत मानसिकता के प्रगटीकरण के रूप में परिभाषित करते हैं ,यह तथ्य सही नहीं हो सकता क्योकि कई व्यक्तिओं में विकृत मानसिकता के लक्षण परिलक्षित होने के पूर्व किसी अन्य मानसिक विकार का कोई इतिहास सामने नहीं आया ,एक और बात तर्कसंगत है अभी तक इसका कोई कारगर इलाज सामने नहीं आया है अतः यह बात साबित होती है की अगर यह अवस्था दूसरे  मानसिक विकारों का प्रागट्य होती तो उनके इलाज से इस विकृति का उपचार संभव होता परन्तु ऐसा नहीं है |

                   दूसरी बात विकृत मानसिकता का शारीरिक रुग्णता से सीधा  सम्बन्ध नहीं है ,जहाँ इलेक्ट्रो एन्सेफैलो ग्राफ और अन्य दूसरे संसाधन अन्य मानसिक विकारों की कुछ न कुछ जानकारी देते हैं ,कम से कम उनके चिकित्सिये लक्षण तो अवश्य ही परिलक्षित होते हैं वहीँ विकृत मानसिकता में चिकित्सिये संसाधनो एवं लक्षणों का पूर्वानुमान संभव नहीं होता |
          अब तक आपको इस विषय की जटिलता का अनुमान तो हो ही गया होगा |

क्रमश:
                                     यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहूँगा की आपराधिक मनोवृति एवं विकृत मानसिकता दो अलग अवस्थाएं हैं ,आपराधक मनोविज्ञान में वर्णित सेक्सुअल डिसऑर्डर, मादक पदार्थों आदि  के  दुरूपयोग का उनके लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण एवं  इलाज संभव है परन्तु अब तक के किसी शोध में विकृत मानसिकता के सफल इलाज की सम्भावना निकट भविष्य में परिलक्षित होती नहीं दिखती है |
                    इलाज का अर्थ यह नहीं की प्रशान्त्कों के माध्यम से व्यक्ति को आजीवन अर्ध निद्रा की अवस्था में रखा जाये ,जैसा की कई मनोचिकित्सक अब तक समझते रहे हैं और अनुपालन करते रहे हैं ,मेरा मानना  है की विकृत मानसिक अवस्था की अब तक की अवधारणा को ठीक प्रकार से समझा ही नही गया और जो भी अवधारणाएं रही हैं वह त्रुटीपूर्ण रही हैं |
         अब हम मनोविज्ञान की एक और शाखा जैव-सामाजिक मनोविज्ञान की चर्चा इसी परिपेक्ष्य में करना चाहेंगे |मनोविज्ञान की इस शाखा में यह अवधारणा दी गयी है की किसी भी रुग्णता के कई कारण हो सकते हैं और इसके उलट एक रुग्णता कई रोगों के जनक हो सकते हैं |यहाँ पर एक कारक को दूसरे कारक के लिए आश्रित माना गया है |
             उदहारण के लिए किसी बच्चे की आरंभिक अवस्था में उसके प्रति किया गया व्यवहार उसके युवावस्था में उसके मानसिक व्यवहार को परिलक्षित करता है ,परन्तु यहाँ भी मेरी आपत्ति एक और उदहारण के द्वारा समझी जा सकती है ,अगर हम एक ऐसे जनसँख्या समूह की परिकल्पना करें जो एक ही विद्यालय के तथा एक ही श्रेणी के छात्र रहे हों सम्भावना यही प्रगट की जा सकती है युवावस्था में उनके मानसिक व्यव्हार एक ही हो ,परन्तु बहुधा यह संभव नहीं हो पाता है और एक ही व्यवहार और विचार में पले बच्च्चों की  मानसिक विचार भिन्नता की प्रबलता स्वाभाविक रूप से अधिक होती है |
            इसी अवधारणा के आलोक में अनुवांशिकी का अवलोकन किया गया है |अब तक दो जीन प्रारूपों का अध्ययन किया गया है – १)MAOA )5-HT T|
                  अनुसंधानकर्ताओं का मानना है की जिन व्यक्तिओं के  जीन प्रारूपों MAOA से रासायनिक घटकों का स्राव अधिक होता विकृत मानसिकता की सम्भावना उतनी ही क्षीण या न्यून होती है |
          दूसरी तरफ 5-HT T के अधिक रासायनिक घटकों के स्राव से अवसाद की सम्भावना प्रबल होती है |
       यहाँ कई मनोवैज्ञानिक यह प्रश्न उठा सकते हैं की मोनोअमीन ओक्सीडेज थेरेपी विकृत मानसिकता के इलाज के लिए कारगर होनी चाहिए और सदियों से इनका प्रयोग मनोचिकित्सा में हो रहा है फिर वह टूटी हुई कड़ी क्या है जिसने इस उलझन को और भी जटिल बना डाला है?
        इसके उत्तर के लिए हमें महत्वपूर्ण परन्तु एक विस्मृत विभाग की और वापस आना होगा और नए विचारों और निष्पक्षता के साथ एक पुरानी अवधारना को शोध कार्य के रूप में नया आयाम देना होगा ,यह अवधारना क्रमिक विकास मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में प्रगट होती है |         
           क्रमश:                      

Monday, January 23, 2012

राष्ट्रीय देवी दिवस|


राष्ट्रीय देवी दिवस|
लगभग चार दशकों पूर्व २४ जनवरी को भारत को अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री स्व .श्रीमती इंदिरा गाँधी के रूप में मिली और २००९ से इस दिन को  हम राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मना रहे हैं |
      कल ही श्रद्धेय निशा मित्तल जी ने मेरे एक लेख पर प्रतिक्रिया दी की अगर भारत की महिलाओं पर  कोई अभद्र चित्रण करे तो वह अक्षम्य है ,उनकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ ,भारत तो क्या विश्व के हरेक स्थान पर महिलाओं का सम्मान हो इसपर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ,मातृ –शक्ति का सन्मान होना ही चाहिए |
            भारत में नारियों को देवी –तुल्य स्थान दिया गया है ,और देवियों को स्वर्ग में होना चाहिए अतः  कोख से  ही स्वर्ग भेजने की समुचित व्यवस्था का जितना प्रबंध हमने किया है वैसा किसी और संस्कृति ने शायद ही किया हो ,चिकित्सा सेवा भले ही और क्षेत्रों में विरल हो पर पर इस सांस्कृतिक योगदान के लिए हर शहर और हर कस्बे में सुलभ और सुगम है ,इस आस्थावान देश में जन्मे और पले-बढे चिकित्सक इस पावन कार्य से कैसे अपने को अलग रख सकते हैं ?
        जिन देवियों को बचते –बचाते  मृत्यु-लोक में आना पड़ गया जीवन पर्यंत उन्हें स्वर्ग पहुचाने की चेष्टा करने में भी हम उद्द्यमशील रहते हैं ,और इस भुलावे में मत रहें की यह सिर्फ पुरानी बात है ,अतीत है ,आधुनिक भारत में हालिया जनसंख्या सर्वेक्षणों पर ध्यान दें ,केरल और मेघालय  को छोडकर किस राज्य में महिला तथा पुरुष का अनुपात बराबर है ?और बारीकी से देखें इन्ही दो राज्यों में हिंदुओं की जनसंख्या आनुपातिक रूप से पूरे भारत में अन्य धर्मों की अपेक्षा कम है ,और उन्ही हिंदुओं ने बचपन से रटा –“यत्र नार्यस्य पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” |
         हमने पंडितों की तरह सिर्फ तोता-रटंत सूक्तियों से अपनी संस्कृति को स्वयं ही विश्व की सिरमौर संस्कृति के रूप में  स्थापित करने का उपक्रम कर डाला |किसी ने आपत्ति की तो एक और सूत्र ,सूत्रों की कमी तो है नहीं ,स्वयं ही रचना और स्वयं ही बाचना है |इसी परम्परा और सभ्यता का ढोल पीट हम प्रफुल्लित होते हैं हम ?
            आकडे बताते हैं भारत में प्रतिदिन ७००० कन्या  भ्रूण हत्याएँ होती हैं ,तो इस हिसाब से साल में दो लाख ५० हज़ार की करीब ,इतना कत्लेआम तो नाजी सेनाओं ने भी शायद ही किया हो ,अगर यह संस्कृति है तो अपसंस्कृति की परिभाषा आप स्वयं बताएँ?
        पत्थर की प्रतिमाओं में देविओं की स्थापना दिनों –दिन बढ़ती जा रही है और अगर उन्हें थोड़ा भी क्षत –विक्षत किया तो हमारे आस्थावान पहरुए आसमान सर पर उठा लेंगे ,मृत देविओं से यश और धन तत्काल प्राप्त होता है और पुरखों का इहलोक और परलोक संवर सकता है ,पर जीवित नारियाँ तो नर्क का द्वार है ,जो उन्हें क्योंकर स्वीकार हो ?
             पत्थर की प्रतिमाएं  उन्हें उबार देगी यहाँ तक की मृत सप्त –सतियों का स्मरण भी ,पर जीवित नारियों से नौका डूबी , तो उन्हें पहले सती हो कर वह योग्यता प्राप्त करनी होगी |
           विडम्बना यह है की नारियों की भागीदारी पुरुषों से कम नहीं ,भ्रूण हत्या और भ्रूण परीक्षण के अधिकतर केंद्र नारी –चिकित्सा कर्मियों द्वारा संचालित और उस केंद्र तक जाने को बाध्य करने वाली सासें भी नारियों हैं |कभी –कभी तो पुरुषों से अधिक |
      थोड़ा संस्कृति का पूर्वालोकन करें ,रामचरित मानस पर एक दृष्टि डालें ,महाराज दशरथ के चार पुत्रों के लिए पुत्र्येष्ठी यज्ञ का आयोजन हुआ अतः पुत्री का प्रश्न ही नहीं ,चारों भाइयों के भी पुत्र होने की चर्चा है ,सीता जी को नारी होने का का कुफल मिला यह तो पूर्वविदित है |द्वापर में आयें ,कौरवों  के १०० भाइयों में एक मात्र बहन ,पांडवों में तो उसका उल्लेख भी नहीं मिलता ,ना उनके किसी पुत्री का उल्लेख हुआ है |क्या यह संयोग मात्र है ?
         पांचाली का जन्म तो यज्ञ से मना गया है पर यज्ञ  वस्तुतः पुत्र प्राप्ति के लिए किया गया ,और पांचाली का हाल भी हमसे छुपा नहीं है |
               पुराणों के आगे भी अगर इतिहास को देखें तो राज –घरानों ने जन्म लेते ही अपनी बेटियों की हत्या करवा दी ,यह भी सर्व –विदित है |
              और आज भी हम कहाँ बदले हैं , रामायण में भी दहेज का उल्लेख है और अब तो और विकराल रूप में प्रथा जारी है ,बेटी की कीमत बाप चुका रहा है ,रेट तय है ,कानून का इससे बुरा हाल हो ही नहीं सकता है |
          अप्सराओं को ना देख पाने की हसरत ने बालिकाओं को बाजार में खड़ा कर दिया ,और दिल्ली में हर रोज क्या हो रहा है ,बताने की ज़रूरत नहीं है ,अखबार पर स्तंभ की भाति हर दिन खबर चपटी ही है , अपनी देविओं को वासना का प्रसाद अर्पित करने तक से शर्म नहीं हमें |जो बच जाती हैं उन्हें भी हर बार बस यही सुकून होता है की बाल –बाल बचे |
          अगर अपवादों को छोड़ दें तो महिला –सशक्तिकरण बस नारों की भाषा है ,विधायिकाओं में ३३ % आरक्षण मिल भी जाये तो खतरा इस बात का है की कहीं कठपुतलियों को ना बैठा दिया जाये ,महिलाओं की सज्जा में ,और डोर किसके हाथ में होगी आपको भी पता है | पंचायत –चुनाओं  में इसकी झलक मिल चुकी है हमें |
          लेकिन इनसब का तोड़ एक है हमारी संस्कृति ,गड्ढे में गिरते जाएँ और सभ्यता का गीत गायें |