Saturday, November 12, 2011

सन्यास, साधना ,साधुता ,खोज सत्य की ,झूटे जीवन से मुक्त होने की खोज है /जिसने जान लिया की यहाँ लाभ -हानि बराबर है ,अब वह इस पागलपन में न पड़ेगा /जिसने जान लिया ,आखिर में हिसाब बराबर हो जाता है / हाथ लाई शून्य जैसा ;ऐसा जान लिया जिसने ,वह इस जीवन से मरने को तैयार हो जाता है /वही सन्यास का कदम है वही सन्यस्त होने की शुरुआत है /

तुमने अब तक जो किया है ,गलत ही किया है /अभी भी देर नहीं हो गयी है / कुछ किया जा सकता है /एक छण में भी क्रांति हो सकती है /
                       मगर पहली बात ,इन चीजों को अब तुम पूंजी कहना बंद करो / अगर तुम इनको पूंजी कहे चले गए तो इसी कहने के कारण इसी में ग्रसित रहोगे /इसीलिए मैं जोर देकर कह रहा हूँ की इसे अब पद मत कहो ,प्रतिष्ठा मत कहो ;जिससे कुछ भी नहीं मिला ,इसे अब तो पूंजी जैसे सुन्दर शब्द देने बंद करो /

                                          आशा के साथ बहुत दिन रह लिए ,कुछ पाया नहीं /अब निराशा से भी दोस्ती कर के देखो /कौन जाने जो आशा से नहीं हुआ , वह निराशा से हो जाये / और मैं तुमसे कहता हूँ ;होता है / जहाँ आशा हार जाती है ,वहां निराशा जीत जाती है /कितने -कितने जन्मों से तुम आशाओं के सहारे चल रहे हो ,अब निराशा का सहारा लो /कितने दिन तक तो तुमने संत्वानाएं खोजीं ,अब सांत्वना मत खोजो / अगर अर्थ-हीनता है तो अर्थ-हीनता सही /अब तुम स्वीकार करो जीवन जैसा है ,अब तुम अस्वीकार मत करो /
                                          और यह नयी आशा नहीं होगी :यह सत्य होगा /आशा-निराशा दोनों चली जाएगी और तुम्हारे भीतर वही रह जायेगा ,जो वस्तुतः है /और उसी में आनंद है उसी में मुक्ति है /